Saturday, March 11, 2017

अँग्रेजों नें हम मधेशियोंको कैसे नेपालियों का गुलाम बनाया

मौर्य सम्राज्य 
               चन्द्रगुप्त मौर्य के पौत्र सम्राट अशोक नें समृद्ध मगध का निर्माण किया । बादशाह अकबर नें उसी साम्राज्य को और भी विशालतम एवं गौरवशाली बनाया । मुगल आधिपत्य के बाद फिर नबाबी शासनकाल आरभ हुआ औऱ उसी नवाबीकाल के १७ वीं सदी का शुरूवात में ही बेपार करने हेतु अँग्रेज भारत आए । १७वीं सदी के मध्य तक में अँग्रेजों नें लगभग पुरे भारत में(गंगा मैदानी अर्थात मधेश सहित) बेपार पर अपने नियंत्रण बना चुकी थी । बेपार करते करते अँग्रेजी हुकूमत ने भारत में चल रहे अधिकतर रियासतों पर भी अपना पूर्ण नियंत्रण बना लिया । याद रहे, मुगल और नवाबी शासनकाल में मालबाजी/लगान उठाने का काम सहज बनाने हेतु भारत भर सैकड़ों "रियासत" का निर्माण हुआ था । उसी रियासतों के जरिए अँग्रेजी हुकूमत भी लगान उठाते रहे ।
ईधर यशोब्रहम खान के वंशज नरभूपाल शाह सन् १७१६ में और उनके बेटे पीएन शाह सन् १७४३ में गोरखा के राजा बने । उस समय मधेश का १ इंच जमीन भी गोरखा के अधिन में नहीं था । उसके बाद :
  •  सन् १७५७ में गोरखाद्वारा कीर्तिपुर पर पहला आक्रमण हुआ जिसमें मधेशी राजा जयप्रकाश मल्ल(ठाकुर थर से मल्ल परिवर्तित ) से बूरी तरह पराजित हुए । उसी युद्ध में कालू पांडे मधेशी सैनिक के हाथों मारा गया और पीएन शाहको भी जीवन दान मिला । 
  • सन १७६४ में फिर आक्रमण और दुसरीबार भी पराजय हाथ मिला ।
  • अन्तत: १७६८ सेप्टेंबर २५ को छल पूर्वक इन्द्रजात्रा कि मध्यरात में आक्रमण कर कीर्तिपुर पर कब्जा जमाते हुए सन् १७६९ तक में पुरे नेपाल(काठमांडु घाटी) पर कब्जा जमाया ।

मकवानपुर(मधेश), जिस वक्त मुगल नवाब कासिम अलि खानके मातहत ही था, पहलीवार सन १७६२ में वहाँ पर आक्रमण हुआ । पीएन शाह नें १७७४ में बिजयपुर चौदण्डी पर भी आक्रमण किया परंतु उस युद्ध में उनके बहुत सैनिक मारे गए । उसी वर्ष अचानक विजयपुर के राजा कर्ण सेन की मौत हो गई । कर्ण सेन के ५ वर्ष के बेटे को क्रूर पीएन शाह नें एक ब्राहमण के जरिए विष खिलाकर हत्या कर डाला । उसके बाद सन् १७७५ जनवरी ११ के दिन पीएन शाह का भी मृत्यु हो गया और फिर उनके बेटे प्रताप शाह राजा हुए । सन् १८०४ में रणबहादूह शाह नें बुटवल के राजा पृथ्वीपाल सेन को कन्यादान के बहाने काठमांडू बुलाकर छल पूर्वक नजरबंद में ले लिया गया और फिर बाद में भीमसेन थापा नें पृथ्वीपाल सेन सहित डेढ दर्जन अंग रक्षकों को काटकह हत्या कर दिया । 
उसके बाद सन् १८०९ में मधेश से हो रहे युद्ध में रणजीत सिंह से बुरी तरह नेपाल हार गई और बचेहुए नेपाली सेना को कांगडा किले में छिपकर जान बचाना पडा ।
ईतना होने के बाद भी सन् १८१६ तक गोरखालियों ने छिप छिपकर मधेश का जमीन पर कब्जा करते रहते थे और अँग्रेजी फौज आनेपर फिर वहाँ से भाग जाते थे । बारबार यह सिलसिला चलता रहा, गोरखालियों नें मधेश में आतंक एवं लूटपाट मचाता रहा और अपनी ऐसी हर्कतों से दक्षिणी भारत की युद्ध में उलझे अँग्रेजी हुकूमत को परेशान करता रहा । पानी सर से उपर हो रहा था, आतंक और लूटपाट से मधेशी भी आक्रोशित हो रहे थे और इसलिए अँग्रेजी फौज नें सन् १८१४ नवम्बर १ में ब्रेड शॉ के नेतृत्व में लौर्ड हेसिंग्टस नें युद्ध का ऐलान कर ही दिया । गोरखालियों के आतंक से आक्रोशित रहे मधेशी उस युद्ध में अँग्रेजों को ही साथ/पक्ष दे रहे थे । युद्ध चलता रहा और :
  • सन् १८१५ अप्रैल २८ में अमर सिंह थापाद्वारा आत्म समर्पन हुआ,
  • ७०० सैनिक सहित सेनापति भक्ति सिंह का अँग्रेजी गोली से मौत हो गई,
  • आक्टरलोनी को काठमांडु आक्रमण का जिम्मेदारी सौंपा गया,
  • सन् १८१५ मई १५ में बम शाह नें आत्मसमर्पन किया और गोरखाली संधि करने पर मजबूर हुआ,
  • राजगुरू गजराज मिश्रको लालमोहर सहित संधि के लिए अँग्रेजों के पास भेजा गया,

संधी में अँग्रेजोंद्वारा रखे गए शर्तों को मानकर संधि-पत्र पर हस्ताक्षर करने के लिए गोरखालियों को १५ और १२ दिनों का मोहलत दिया गया । मोहलत बाद कोई रिस्पोंस नहीं आनेपर सन् १८१६ फरवरी में २० हजार सैनिक(मधेशी और यूरोपियन सहित) लेकर युद्ध के लिए रवाना हुए । मकवानपुर गढी में गोरखालियों नें उस सेनाको रोकने का प्रयास किया परंतु सैकडों गोरखाली सैनिक मारे गए और फिर दुबारा रोकने का प्रयास भी नहीं कर सका । जब देशी और अँग्रेजी फौज काठमांडु की ओर बढने लगी तब हडबडाते हुए सुगौली में की गई संधी पर हस्ताक्षर करके चन्द्र शेखर उपाध्याय आक्टरलोनी के पाउ में हाजिर हुए । 

गोरखालियों द्वारा बहुत अनुनय विनय किया गया । उस के बाद और लगान उठाने की सहजता को ध्यान देते हुए ८ दिसंबर१८१६ में फिर अँग्रेजों नें सालाना २ लाख रूपयों में पूर्वी मधेश का जमीन नेपालियों के हाथों भांडे में सौंप दिया । उसी दिन से नेपाल अँग्रेजों का अघोषित दास बन गया । उस सुगौली संधी को आजतक नेपाली लोग "असमान संधी" बताते आ रहें है ।
अँग्रेज के बलपर टिकी नेपाली राणा सरकार तरफदारी करनेपर मजबूर था । सन १८५७-५९ में अँग्रेज विरूद्ध भारतीय सिपाही बिद्रोह शुरू हो गया । उस सैन्य विद्रोह में भारतीय सिपाही को दबाने के लिए तात्कालिक प्रधानमंत्री जंग बहादूर नें सन् १८५७ जूलाई २ में छह रेजिमेंट गोरखाली फौज हिन्दुस्तान भेज दिया । हेवलक के नेतृत्व में रहे अँग्रेजी फौज से मिलकर नेपाली फौज नें भारतीय विद्रोहियों पर भारी दमन किया । विद्रोह और तेज होने के कारण फिर सन् १८५७ दिसंबर १० में ३ पल्टन के साथ जंगबहादुर स्वयं लखनऊ पहुंचे । उसके बाद विद्रोह शांत हुआ । उसी मदत के बदले सन १८६० नवंबर १ में अँग्रेज खुश होकर एक संधि मार्फत पश्चिम मधेश के बाँके से कंचनपुर तक का जमीन उपहार में नेपाल को दे दिया ।
इस तरह मधेश की हमारी यह जमीन हमसे पुछे बगैर दो संधी के तहत सन् १८१६ और सन् १८६० में अँग्रेजोंद्वारा नेपालियों को सौंपा गया और मधेशियों को उपनिवेश में धकेल दी गई । हमारी जमीन हरण का यह ही संक्षिप्त इतिहास है ।
लेखन - ई. श्याम सुन्दर मण्डल |
(
श्रोत : मधेश का ईतिहास, भारतीय ईतिहास)

Tuesday, March 7, 2017

फिरंगी पुलिस, सेना और संविधान जबतक मधेश में रहेगा तबतक मधेशियों की हालत यही होता रहेगा -डा.सी.के. राउत


शासक उन नागरिकों से डरता है जिनमें शासन निर्माण करने की क्षमता और संभावना रहती है | नेपाली हर नागरिक में वह संभावना और क्षमता दोनों मौजूद है | एक नेपाली चाहे और मेहनत करे तो वह नेपाली शासन को आसानी से परिवर्तन कर सकता है | नेपाली मुल्क का संविधान, कानून और सरकार बदल सकता है | जिसको चाहे उसे कारवाही कर सकता है | जब चाहे नेपाली संरचना को बदल सकता है | यही वजह है कि हर एक नेपाली नागरिक से पुलिस, सेना, नेता, सरकार और शासक डरता है | उनकी सुनता है और उनके पक्ष में निर्णय लेता है |
क्या वही क्षमता और संभावना किसी मधेशी नागरिक में नेपाली राज या सेनाको दिखाई देती है ? कोई एक मधेशी शिक्षा, अर्थ, नेतृत्व, विद्वता आदि में पूर्ण सक्षम होनेपर भी क्या उन मधेशी में नेपाली राज की शासन, सत्ता, संविधान, कानून बदलने की क्षमता है ? स्पष्ट है, किसी मधेशियों में वह ताकत नहीं है कि वे पार्टी खोले, नेपाली चूनाव में बहुमत हासिल करे और नेपाली राजसत्ता को परिवर्तन कर दे | क्यूँकि गुलाम नागरिक में वह ताकत नहीं होती कि वह मालिकद्वारा बनाए गए राजसत्ता को नियन्त्रण कर सके, मधेशी जनता की हक अधिकार संविधान में लिख सके और सुख सुविधा पहूँचाने के लिए बहुमत का सरकार बना सके |
गुलाम नागरिक मालिक के अधिन रहकर केवल गुलामी ही कर सकता है | समस्या आनेपर मालिक से आग्रह कर सकता है | अच्छा और मनपसंद सेवा करनेपर साबासी एवं ईनाम पा सकता है । मालिक को खुशी बनाकर कभी कभार कुछ अधिक लाभ भी ले सकता है। यही सत्य है | यही मधेशियों का नेपाली राज में हक और अधिकार है |
वीर मधेशी शहिद २०७३ फाल्गुन २३ गते राजबिराज
आश्चर्य तो ईस बातपर है कि सत्यको जानकर भी हम और हमारे मधेशी नेता अञ्जान बैठे हैं। वर्षों से वही मांग, वही तरीका, वही आन्दोलन, वही सम्झौता, वही सरकार और वही गोलचक्र में मधेशी उलझते आ रहे हैं | समस्या उपनिवेश का है ईलाज संघीयता में ढूँढ रहे हैं | सम्मान मधेश राष्ट्र में है पहचान नेपाली राष्ट्रियता में खोज रहे हैं | रघूनाथ ठाकुर से लेकर आज राजेन्द्र, महन्थ और उपेन्द्र यादव तक नेपालीतन्त्र के उसी महाजाल में फँसे हुए हैं |
हमें अब नेपाली राज के चक्रब्यूह से निकलना होगा | उन मधेशी नेताओं के जाल से भी मुक्त होना होगा जो ईस चक्रब्यूह में रखे रहने को मजबुर करते आएं हैं | हमें अब खुद नेतृत्व लेना होगा | घर-घर से सड़क, चौक, नगर और शहर से आजाद़ी का झण्डा लेकर निकलना होगा | स्वतन्त्र मधेश गठबंधन में न ही सही, अपने अपने जगह, पार्टी, संगठन हर स्थान से आजाद़ी के लिए विद्रोह करना होगा | हाथ में आजाद़ी के झण्डे, साथ में स्वतन्त्र मधेश गठबंधन के ३ आधार स्तम्भ और जुबान पर 'नेपाली उपनिवेश अन्त हो मधेश देश स्वतन्त्र हो' तथा 'अबकी बार एक ही मांग, जनमत संग्रह का हो ऐलान' का नारा लेकर हजारों हजार की भींड़ विना भय और त्रास के निरन्तर आगे बढ़ना होगा |
यही एक मात्र विकल्प है | अन्तिम और कठोर विकल्प है | दुसरा कुछ भी नहीं |
जय मधेश, आजाद़ मधेश !

Monday, February 27, 2017

स्वतंत्र मधेश देश ही क्यों चाहिए, दूसरा समाधान क्यों नहीं ?

  •  फिरंगी नेपाली सेना और पुलिस को मधेश से वापस करने के लिए, और उसकी जगह पर मधेशी सेना और पुलिस बनाने के लिए। यह तभी ही हो सकता है जब मधेश आजाद होगा, अन्यथा नहीं। और जब तक मधेश की अपनी सेना नहीं होती है, तब तक कोई संविधान, कोई नियम-कानून, कोई शासन-व्यवस्था, कुछ भी मायना नहीं रखता; चाहे संविधान में जितना भी अधिकार लिखवा लें, कोई अर्थ नहीं रखता। फिरंगी नेपाली सेना को लगाकर पाया हुआ सारे अधिकार को पल भर में नेपाली शासक छीन सकते हैं। अभी मधेश में ९५% से ज्यादा सेना मधेश के बाहर से आकर कब्जा जमाकर बैठी हुई है, पूरी की पूरी नेपाली सशस्त्र पुलिस हमारे घर-दरवाजे पर बन्दुक लेकर खडी हैं। मधेश को मुक्त करने के लिए उन फिरंगी नेपाली सेना और पुलिस को वापस करना ही होगा, और मधेशी सेना और पुलिस बनानी ही पडेगी। इससे लाखों मधेशियों को नौकरी भी मिलेगी।
  • पहाडियों द्वारा हो रहे मधेश का कब्जा रोकने के लिए। मधेश के अस्तित्व के लिए सबसे ज्यादा खतरनाक है फिरंगी नेपालियों का मधेश में आकर कब्जा जमाना, मधेश की जमीन हडपकर यहाँ पर बस जाना। इस तरह से नेपाली लोग पूरे मधेश पर कब्जा जमाना चाहते हैं; झापा, चितवन और कंचनपुर जैसे जिलों में तो पहाडी लोग पूरी तरह कब्जा जमा ही चुके हैं और वहाँ पर मधेशियों की हालत क्या है, आप देख सकते हैं। आज से ६० वर्ष पहले मधेश में केवल ६% पहाडी लोग थे, पर आज ३६% हो गए। अगर इसे अब भी नहीं रोका गया, तो पूरे मधेश पर पहाडी लोग कब्जा जमा डालेंगे, और मधेशियों को मधेश से ही भागना पडेगा, शरणार्थी होना पडेगा। और पहाडियों के इस आप्रवासन को तभी ही रोका जा सकता है, जब मधेश आजाद होगा, अन्यथा नहीं।
  • मधेश की नौकरी मधेशबासियों को ही देने के लिए: नेपाली साम्राज्य में मधेशियों को नौकरी मिलना नामुमकिन सा हो गया है। नेपाली शासक मधेशियों को कोई नौकरी नहीं देना चाहते हैं, मधेश में भी पहाडी ही कर्मचारी, सिडिओ, एसपी को रखते हैं। तो मधेश की नौकरी मधेशबासियों को ही देने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, अन्यथा मधेश के बाहर से लाकर पहाडियों को ही नौकरी दिया जाता रहेगा, और बेचारे मधेशी लोग बेरोजगार दरदर भटकते रहेंगे। खाली मधेश प्रदेश बन जाने से यह सम्भव नहीं होगा, उसमें तो ओखलढुंगा या डोल्पा से आकर पहाडी लोग ही मधेश के मुख्यमंत्री भी बन सकेंगे; सिडिओ, एसपी, कर्मचारी भी पहाड से ही आकर बनेंगे।
  • नागरिकता, सुरक्षा और विदेश नीति अपने हाथों में लेने के लिए: मधेशियों के लिए नागरिकता, सुरक्षा और विदेश नीति बहुत ही महत्वपूर्ण रहा है और उसको पूर्णत: अपने हाथों में लेने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा। अन्यथा नागरिकता देने या खारिज करने का अधिकार, विदेश या सुरक्षा नीति बनाने का अधिकार सदैव नेपाली शासकों के हाथों में ही रहेगा, और नेपाली शासक मधेशियों को नागरिकता विहीन करके, मधेश में सेना और सशस्त्र पुलिस लगाकर दमन करके, सीमाक्षेत्र में अपनी मनमानी से नीति लगाके मधेशियों को अनागरिक, राज्यविहीन और शरणार्थी बनाते रहेंगे।
  • अपना साधन-स्रोत, खानी, राजस्व, पैसा, वैदेशिक अनुदान, लगानी आदि पर पूर्ण अधिकार कायम करने के लिए और अपने विकास में लगाने के लिए: मधेश के साधन-स्रोत, खानी, राजस्व, पैसा, वैदेशिक अनुदान, लगानी आदि पर पूर्ण अधिकार कायम करने के लिए और अपने विकास में लगाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, तभी ही उन चीजों पर मधेशियों का पूर्ण नियन्त्रण हो सकता है। अन्यथा उन चीजों पर नेपाली शासक अपना आधिपत्य जमाए रखेगा, और सारे साधन-स्रोत, राजस्व, वैदेशिक अनुदान, पैसा पहाड की ओर ले जाता रहेगा, पहाड के लिए खर्च करता रहेगा।
  • स्थायी रूप से अधिकार पाने के लिए: चाहे कोई भी अधिकार हो, स्थायी रुप से पाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा। अन्यथा जो अधिकार पहले मिल भी चुका रहता है, वह भी नेपाली शासक मौका मिलते ही छीन लेता है। यहाँ तक की वितरण की हुई नागरिकता को भी हजारों की संख्या में खारेज कर देता है, तो दूसरी चीजों की बात ही क्या! संविधान या सम्झौता में मधेशियों का अधिकार स्पष्ट लिखे रहने के बाबजूद भी मौका मिलते ही नेपाली शासक उसको उलटा देता है। इसलिए स्थायी समाधान की ओर जाना ही होगा, भूलभूलैया में अब नहीं रह सकते। अगर हमारे हाथ नेपाली फिरंगियों ने बाँध दिया है, तो हमें इनसे बार-बार भीख मांगने की बजाय, कुछ खाने के लिए दे दो कहके बार-बार इनके पैर पकडकर गिडगिडाने की वजाय, अपना हाथ हमें खोलना होगा। वही स्थायी समाधान है, उनसे भीख मांग-मांग कर, उनकी कृपा पर हम कब तक जी सकते हैं ?
  • गुलामी से मुक्ति और आत्मसम्मान के लिए: आखिर कब तक हम गुलाम की तरह नेपाली राज में जीते रहेंगे, कब तक दूसरे-तीसरे दर्जे के नागरिक बने रहेंगे ? उससे मुक्ति पाने के लिए मधेश को आजाद करना ही होगा, अपने आत्मसम्मान के लिए भी मधेश को आजाद करना ही होगा। गुलामी की जंजीर को तोडना ही होगा।

ऊपर की ये बातें खाली मधेश प्रदेश बन जाने से समाधान कदापि नहीं हो सकेगा, स्वतन्त्र मधेश अलग देश बनने से ही हो सकेगा, इसलिए मधेशियों को ‘आजाद मधेश’ के लिए ही लडना होगा।

Monday, March 21, 2016

Why India should Support an Independent Madhesh?

Today , the PM of Nepal is in China and there has been signing of some agreement between China and Nepal. If one looks seriously in the approach adopted by Nepali establishment , even a fool can conclude that Nepal has been always acting as an anti Indian state .
The recent signing of the agreements is somewhat aimed at decreasing the Indian Influence or say Nepal's inevitable dependence on India . The past activities of Nepal with regards to India have also been not of friendly kind. We have plenty of such incidents which clearly points to the anti Indian stand of Nepali state which is largely dominated by Hilly elites of Nepal.
The same Hilly elites are dead against the Madheshis , the native dwellers of southern Plain Land  of Nepal. In last 200+ years , these hilly elites have run the most discriminatory colonial rule over the Madheshis. The madheshis in spite of sharing a blood relation with people in adjacent Indian states of Bihar and UP have been forced to go through discrimination and subjugation for centuries and India has been mute spectator to all these atrocities fundamentally for two reasons . Firstly India has always tried to appease the Kathmandu establishment for no substantial reason . Secondly , In spite of dominance of political leaders from UP and BIhar  in Delhi , they have been either self content with their knowledge of Madhesh/Nepal , they have failed to understand the very situation at ground, may be they have been misinformed  by the suggestions of the bureaucracy. There is never too late to correct the mistakes .It is now evident that Kathmandu will always act against the interest of India , it is high time India should stop appeasing Kathmandu and stop ignoring calls of madhesh . The new generation of Madhesh is likely to strongly pitch in favor of Independent Madhesh and India has very limited choice to opt for in this regard . India can at best support this movement or at worst can stay neutral , but if India chooses to side by racist regime in Kathmandu , the result will be catastrophic for all concerned .

Thursday, February 26, 2015

मधेश में नेपाली उपनिवेश



मधेश में नेपाली उपनिवेश :-
मधेश राष्ट्र आज परतन्त्र अवस्था में है, आज यह नेपाल का उपनिवेश है ! मधेश राष्ट्र जिसका अपना गौरवशाली इतिहास रहा है, जहाँ पर एक से एक शूरवीर राजा महाराजा हुए, वह आज नेपाल के औपनिवेशिक शोषण के तले दबा हुआ है !
अंग्रेजों ने ईस्वी १८१६ और १८६० में मधेश को नेपाल के राजा को दे दिया

मधेश केवल सन १८१६ और १८६० में नेपाली साम्राज्य के अधीनस्थ हुआ ! प्रति बर्ष दो लाख रुपए भुगतान के बदले, सन १८१६ में अंग्रेजों ने मधेश के पूर्वी भाग नेपाल के राजा को दे दिया ! उसी तरह , भारत में सन १८५७-५९ के दौरान हुए सिपाही विद्रोह को दबाने के लिए नेपाल के राजा द्वारा दिए गए सैन्य सहयोग के बदले उपहार स्वरूप अंग्रेजों ने पश्चिम मधेश नेपाल के राजा को दे दिया ! इस प्रकार से मधेश नेपाल का उपनिवेश बना था !
नेपाली सेना और शासक मधेश में मधेश बाहर से आकर बसे हैं और वहाँ पर अपना नेपाली शासन लादे हुए हैं, तो यह यह आन्तरिक उपनिवेश कैसा ? यह पूर्ण उपनिवेश है ! नेपाली लोग मधेश के लिए बाह्रा-तत्व है 

मधेश में रहे नेपाली शासन का चरित्र विशुद्ध रूप से औपनिवेशिक शोषण पर लक्षित रहा है, जैसे --

१. मधेशी सेना का उन्मूलन और नेपाली सेना में मधेशियों के प्रवेश पर अघोषित प्रतिबन्ध,

२. मधेश बाहर से नेपाली सेना लाकर पुरे मधेश में सैन्य बैरेक और चेक पोस्ट खड़ा करना, ( इसकी तुलना ईस प्रकार की जा सकती हैं; मानो अमेरिका में अमेरिकी सेना का उन्मूलन करके अमेरिकी जनता को ही सेना में भारती पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाय और उत्तर कोरिया की सेना जाकर पुर अमेरिका में बैठ जाएँ, तो उसे क्या कहा जाएगा ?)

३. मधेशी जनता से भारी और अनुचित कर, भन्सार और राजश्व वसूली करना पर मधेश में उचित लगानी क करना 

४. मधेश के वन -जंगल, खान, नदी नाले और जमीन सहित के प्राकृतिक संसाधनों का दोहन करना,

५. मधेशी आदिवासियों की भूमि पर कब्ज़ा करके उसे नेपाली प्रशासन, सेना और पुलिस में बाँट देना

६. सरकारी योजनाओं द्वारा नेपाल के शासक वर्ग के लोगोंको लाकर मधेश में बसाना,

७. मधेशियों को नेपाल आने-जाने के लिए ( सन १९५८ तक) पारपत्र या पासपोर्ट लेने की जरूरत होना 

८. नेपाली शासकवर्ग की भाषा, वेश और संस्कृति मधेश पर लादना,

९. मधेशियों को कमैया और कमलरी सहित के दास बनाना,

१०. मधेशियो के लिए अलग नियम कानून होना, जैसे की भूमि स्वामित्व पर अलग हकबन्दी, मुलुकी ऐन में मधेशी जात-जातियों के लिए अलग दण्ड-व्यवस्था आदी

जिस तरह से भारत में अंग्रेजो का औपनिवेशिक राज था, उसी तरह नेपालियों का औपनिवेशिक राज मधेश में है ! पर तुलनात्मक रूप में, भारत में रहे अंग्रेजी औपनिवेशिक शासन से मधेश में रहे नेपाली औपनिवेशिक शासन ज्यादा कठोर रहा है, जैसे की :-
१. बाह्रा सैन्य शक्ति की उपस्थिति :- अंग्रेजो के उपनिवेश में भारतीय सेना में बहुत ही कम प्रतिशत अंग्रेजी सैनिक थे, बाकी सैनिक भारतीय ही थे ! जैसे सन १८५७ के सिपाही विद्रोह के दौरान ९०% सैनिक भारतीय थे, केवल १०% अंग्रेज थे ! दुसरे विश्व युद्ध के दौरान केवल ३% सैनिक ही अंग्रेज थे, बाकी भारतीय ही थे ! पर मधेश की भूमि पर पूर्णत: नेपाली सेना आकर बैठी हुई है, और उसमें मधेशियों की संख्या लगभग नगन्य है !
२. प्रशासन और कर्मचारी :- अंग्रेजो के शासनकाल में भारत में कितने प्रशासक और कर्मचारी अंग्रेज थे और कितने भारतीय थे ? पर मधेश में बहुसंख्यक सरकारी प्रशासक और कर्मचारी नेपाली है, मधेशी नही !
३. लगान और राजश्व:- अंग्रेज भारत से लगान उठाते थे तो कुछ हद तक विकाश भी करते थे और जनता के लिए उचित व्यवस्था और प्रणाली कायम करने के लिए तत्पर रहते थे ! अंग्रेजों द्वारा संसार के सबसे बड़े रेलवे नेटवर्क को में से एक का भारत में निर्माण करने के कार्य को आज भी सराहा जाता है ! दूसरी ओर नेपाली शासक मधेश से भारी मात्र में लगान और राजश्व वसूली करते है, यहाँ तक की कुल ग्राहस्थ उत्पादन के ५९% और राजश्व के ७६% योगदान मधेश से मिलते हैं ! पर उनमें से अधिकांश शासक वर्ग के लोग अपने क्षेत्र में लेकर चला जाता है और वह उनके स्वार्थ का परिपोषण करने पर खर्च होता है ! वे मधेश में एक हुलाकी सड़क का निर्माण और मरमत करने तक पर ध्यान नही देते है, वही पहाड़ में फ़ास्ट ट्रयाक सुरंग मार्ग और चार और छह लेन की सडकें बनाते है !
४. आप्रवासन और विस्थापन :- सन १५५१ से सन २००१ बिच के ५० बर्ष के दौरान पहाड़ से आप्रवासित होकर मधेश में बसे पहाड़ियों की जनसख्यां ६% से बढकर ३३% हो गई, और भारी संख्या में मधेशी आदिवासी विस्थापित हुए ! भारत में आकर बसे अंग्रेज भारत की जनसंख्या के कितने प्रतिशत थे, और कितने भारतियों को विस्थापित किया गया ?
५. इतिहास और संस्कृति :- अंग्रेजो के शासनकालमें भारतीय इतिहास, संस्कृति, भाषा और साहित्य पर व्यापक खोज हुई ! पर नेपाली उपनिवेश काल में नेपाली भाषा, भेष भूषा और संस्कृति लादने के साथ साथ मधेशियों का इतिहास, पुरातत्व, भाषा, साहित्य, संस्कृति, भेष भूषा आदि को मिटाने की निति ली गई और मिटाने की कई प्रयत्न किये गए !
६. साधन स्रोत पर नियन्त्रण :- नेपाली उपनिवेश में मधेश के जल, जमीन और जंगल पर मधेशियों को कितना अधिकार दिया गया है ? नेपाल के शासकवर्ग मधेश के जंगल को कटवाकर बेच डाले, पर मधेशियों को अपने ही खेत का एक सुखे वृक्ष काटने के लिए भी नेपाल सरकार से अनुमति लेनी पडती है, मधेशियों के द्वरा एक भार जलावन एक जगह से दूसरी जगह लाने पर नेपाल पुलिस उन्हें पकडती है! अपने ही खेत के उपजे चार-पाँच किलो दाल या सुपारी एक जगह से दूसरी जगह लाते वक्त नेपाली पुलिस मधेशियों को तस्कर कहके यातना देती हैं !
७. दासता:- नेपालियों ने लाखो मधेशियो की जमीन हडपकर उन्हें अपनी ही जमीन पर भूमिहीन बनाकर कमैया, कमलरी और दास बना दिया ! कई मधेशी सदा के लिए विस्थापित हो कर शरणार्थी हो गए! जो रह गए वे  नारकीय जीवन जीने के लिए मजबूर हो गए और नेपाली शासक के शारीरिक, मानसिक और यौन शोषण का शिकार बनते रहे !              

मधेश के मुद्धे



१. नेपाली उपनिवेश
अंग्रेजों ने सन १८१६ और १८६० की सन्धियों के द्वारा मधेश को नेपाल के राजा को सौप दिया,और सन १९२३ की सन्धि द्वारा नेपालको स्वतन्त्र देश के रूप में मान्यता देने के बाद मधेश नेपालका उपनिवेश बन गया ! यहाँ तक की १९५८ तक मधेश से नेपाल (घाटी) जाने के लिए मधेशियों को पासपोर्ट लेना पड़ता था, जो चिसापानी गढ़ीमें जाँच की जाती थी !
२. रंग भेद
मधेशियों को "काले" मानकर उनके साथ नेपाली राज में भेदभाव किया जाता है और मधेशी लोग अनेकों सामाजिक दुर्व्यवहार के शिकार होते रहे हैं !
३. दासता
मधेशियों को नेपाली शासक कमैया, कमलरी और दास बनाकर शोषण करते रहे है ! यहाँ तक की क़ानूनी रूपमें किसी गुनाह की सजा स्वरूप नेपाली राज में १९२० तक मधेशियो को दास बनाया जा सकता था !
४. विस्थापन
सन १९५१ से २००१ के बीच मधेश में नेपालियों/पहाड़ियों की जनसंख्या ६% से बढकर ३३% हो गई ! उसी तरह सन २००१ में नेपाली साम्राज्यकी पूरी जनसंख्या का ४८.४% मधेश में था परन्तु सन २०११ में वह बढकर ५०.३% हो गई ! ईस तरह से पहाड़ियों का मधेश की भूमि पर आकर कब्ज़ा करके बस जाने से भारी संख्या में मधेशी आदिवासी लोग विस्थापित होते रहे हैं !
५. जातीय सफाया और दंगे
 मधेशी लोग नेपाली राज में अनेकों जातीय सफाया और दंगे के शिकार होते रहे हैं ! ऋतिक रोशन काण्ड और नेपालगंज घटना जैसे दंगो को फ़ैलाने और प्रश्रय देने में नेपाली प्रशासन और पुलिस का भी हाथ रहता आया है !
६. नागरिकता
आज भी लाखो मधेशी नागरिकता से विहीन है, जिसके कारण वे भूमि स्वामित्व से लेकर सरकारी नौकरी और सेवा से भी वंचित रहते आए हैं !
७. मौलिक अधिकारों का हनन
अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता लगायत के मौलिक अधिकारों से कई मधेशी वंचित होने क्व साथ साथ नागरिकता के अभाव में लाखों मधेशी मतदान अधिकार से भी वंचित होते रहे हैं !
८. आर्थिक दोहन
मधेश के जल, जमीन और जंगल लगायत के स्रोतों पर नेपाल सरकार मधेशी प्रतिकूल नियन्त्रण कायम करने के साथ-साथ राजस्व, सीमा शुल्क, बजार नियन्त्रण, व्यापार आदि सम्बन्धी आर्थिक निति मधेशियों को व्यापक शोषण करने पर लक्षित करके मधेशका आर्थिक दोहन किया जाता है ! 
९. नेपालीकरण
मधेश में नेपालियों को पहाड़ से लाकर बसाके तथा मधेश में नेपाली भाषा, वेश और संस्कृति लादकर मधेश का नेपालीकरण किया जाता रहा है !
१०. असमान कानून और व्यवस्था
नेपाली राज में मधेश और मधेशियों के लिए कानून और व्यवस्था असमान रहती आई है ! वर्तमान में भी नागरिकता, भूमि हदबन्दी, वन उपभोग, भाषा-संस्कृति, आप्रवासन आदि सम्बन्धी कानून मधेसियों प्रति अन्यायपूर्ण है ! 
११. सीमावर्ती क्षेत्रों में यातना
नेपाल और भारत दोनों ओर के सुरक्षाकर्मियों और अधिकारीयों के द्वारा मधेशी लोग उत्पीडित होते रहे हैं ! भारतीय मुद्रा का अभाव और सीमा आरपार करने पर दुर्व्यवहार झेलने से लेकर भारतीय बाँध के कारण दर्जनों मधेशी गाँव बाढ़ और डूबान से पीड़ित होने तक, अनेकों समस्याओं से मधेशी लो उत्पीडित होते रहें हैं !
१२. गैर न्यायिक हत्या
एक के बाद दूसरी सुरक्षा योजना और सुरक्षा विधेयक लाकर नेपाल सरकार द्वारा दर्जनौ निर्दोष मधेशी कार्यकर्ताओं हत्याएँ की जा रही है !
१३. विकास का आभाव और गरीबी
उर्बर भूमि और अन्न के भण्डार के लिए जाने गए मधेश नेपाली राज की नीति के कारण आज विकास का अभाव और गरीबी से उत्पीडित है! सिंचाई व्यवस्था, सड़क, अस्पताल और काँलेज जैसे मधेश के भौतिक, पूर्वधार उपेक्षित होने के साथ-साथ मधेशियों की बहुत बड़ी संख्या गरीबी और कुपोषण के शिकार हो गई हैं ! मधेश में १९% परिवार अति खाध्धान्न आभाव वाले परिवार है ! ५०% बच्चे रक्त अल्पता के शिकार है, २०% बच्चे अपक्षय की स्थिति में है और ४२% महिलाएँ रक्त अल्पता के शिकार है ! नेपाली राज में सब से कम साक्षरता दर वाले जिले भी मधेश में हैं और मधेश की जिलो का मानव विकास सूचकांक भी बहुत कम है !  
१४. विवेद और उपेक्षा
नेपाली राज संयन्त्र के हर क्षेत्र में मधेशियों के प्रति विभेद रहा हैं और हर क्षेत्र में प्राय: मधेशियों को १२% से कम ही स्थान मिला है ! निजामती सेवा/प्रशासन में केवल ८-९%, न्यायपालिका में केवल ८% और तथा सुरक्षा निकायों के उच्च पदों में लगभग न्यून % मधेशियों की उपस्थिति रही है ! नेपाली नागरिक समाज और मिडिया से भी मधेशी बहुत उपेक्षित हैं !
१५. अन्तराष्ट्रीय दबाब
मधेश प्रति संयुक्त राष्ट्र संघ, संयुक्त राज्य अमेरिका, भारत, विलायत,चीन लगायत के अन्तराष्ट्रीय शक्तियों की भी स्पष्ट या अनुकूल निति नही होनें की वजह से अन्तराष्ट्रीय समुदाय द्वारा भी मधेशी पीड़ित है ! यहाँ तक की विदेशी अनुदान, सहयोग और परियोजनाओं में भी मधेशियों को उचित हिस्सा नही मिल पाता हैं !

Sunday, January 19, 2014

मधेसी सहीद र मधेस क्रांति

रघुनाथ ठाकुर "मधेसी"
मधेस मुक्तिको नाममा सन १९५०-६० ताका सहीद रघुनाथ ठाकुरद्वारा उठान भएको 'मधेस क्रांति' होस अथवा बि.स. ०६३-६४मा सहीद रमेश महतोको सहादतबाट शुरुआत भएको ५४ महान बलिदानी सहितको 'मधेस बिद्रोह', यी सबै घटनाहरुले मधेसीहरू उपनिवेशमा छ, उत्पीड़नमा छ, शोषण र दमनमा छ भन्ने सत्यताको उद्घाटन मात्र गर्न सकेको छ । तर, यी सबै खालको उत्पीडनहरूबाट पूर्ण मुक्ति दिलाउने गान्धी, मण्डेला जस्ता उच्च छवि र क्षमता भएको 'मधेस मुक्तिदाता'को जन्म हुन नसकेको दुखद परिस्थिति छ ।

हुनत ०६३/६४ मा रातारात एउटा अविश्मरणीय "मधेस जन बिद्रोह" भयो तर त्यो बिद्रोह तल्लो तह(वाड, गाउँ) सम्मको जनतालाई व्यापक रूपमा संगठित गरी संघर्ष सहितको पूर्व तयारीबाट न उठेकाले त्यस बिद्रोह मार्फत उदाएका केही भाग्यशाली नेताहरूमा आन्दोलन र क्रांतिको दुख, पीड़ा, मर्म, त्याग जस्ता तत्वहरूको कुनै अनुभूति नै भएन । परिणाम : ती सबै नेताहरु स्वार्थी, पद, पैसा, मौजमस्ती र सत्ता लोलुप बन्न पुगेको यथार्थबाट हामी भाग्न न सक्ने अवस्था छ ।

यस्तो परिस्थितिमा आत्माले चाहेपनि नचाहे पनि ०६३/६४को 'मधेस बिद्रोह'मा सहादत प्राप्त गरेका सहीदको सम्झनामा आज ती लोलुप मधेसी दल र नेताहरू सहीदका तस्वीर, शालिक र मूर्तिहरूमा फूल, अबीर अरपण गरी "सहीद दीवस" मनाई रहेका छन । तर, क्रांतिकारीहरूले सोच्नुपऱने कुरा के हो भने स्वार्थीहरूको दीवस मनाउने शैली जेसुकै होस हामी पूर्ण श्रध्दा र क्रांतिको भविष्य अत्यंत उज्ज्वल छ भने विश्वास सहित आत्मीयताका साथ मनाऔं ।
-वीर सहीद अमर रहोस्, मधेस क्रांति जिन्दाबाद....

Friday, January 17, 2014

हाम्रा मधेसी नेताहरुको वास्तविक चरित्र !!!!



       प्रसंग (१) ः २०४८ सालतिर संसदमा गजेन्द्र नारायण सिंहज्यूले तुम जुर्म करो त कुछ भी नही... हम उफ करे तो बागी हैंभन्दै मधेश र मधेशीको पीडाहरूका सम्बन्धमा आफ्नो मन्तव्य दिनुभयो ।
असर ः सुशील कोइरालासँगै बसेका रामवरण यादव (तत्कालीन सभासद्)ले मधेश, हिन्दी र गज्जुबाबुको विरोध गर्दै भन्नुभयो, “सभामुख महोदय गज्जुबाबुले कुन देशको भाषा बोल्नु भा हो मैले बुझिन...
परिणाम ः नेपाली कांग्रेसले रामवरण यादवलाई तत्काल चरम राष्ट्रवादी मान्दै उहाँलाई स्वास्थ्य राज्यमन्त्री बनायो ।

      प्रसंग (२) ः २०४८ सालको निर्वाचनमा सर्लाही५ (तत्काल) बाट नेपाली कांग्रेसका उम्मेदवार महन्थ ठाकुर र सद्भावनाबाट उम्मेदवार गजेन्द्रनारायण सिंह थिए । ठाकुरले सिंहलाई लक्षित गर्दै भनेका थिए, “गजेन्द्र नारायण सिंह साम्प्रदायिक र विखण्डनकारी मान्छे हुन् ।

      प्रसंग (३) ः २०५१ सालको मध्यावधि निर्वाचनमा सप्तरी२ (तत्काल) बाट गजेन्द्र नारायण सिंह र सद्भावना पार्टीलाई गाली गरेका जितेन्द्र देवले एमालेभित्र आफ्नो खसभक्ति नवीकरण गर्न भ्याएका थिए । गजेन्द्र नारायण सिंह भारू छाप्ने टकसार हो । विखण्डनकारी, डकैत, भारतीय दलाल, मधेशी उचालेर देश टुक्राउने प्रपञ्चकारी हुन् ।अहिले उनै जितेन्द्र देव चर्का मधेशवादी भएका छन् ।
परिणाम ः एमालेमा उनी चर्का राष्ट्रवादी भएर आयोगहरूमा पटकपटक मनोनित हुने सौभाग्य पाए ।

    प्रसंग (४) ः एमालेमै रहेका जितेन्द्र देवले २०६४ चैत्रमा राजविराजस्थित नेता चौकको चुनावी सभामा जय मधेशफेशन हो भनेका थिए । विदेशी शक्तिसँगको सामिप्यता र देवको कार्यशैलीमाथि एमालेले अविश्वास (सुराकी) गरेको शंकामा देवमाथि कारबाही गरेपछि उनी मधेशी कित्तामा प्रवेश गरे ।
मधेशी कित्तामा छिरेर पार्टी फुटाउने परियोजनामा सक्रिय रहेका देव हाल मजफो लोकतान्त्रिकका महासचिव छन् र सभासद् बन्न नपाएको झोकमा निर्वाचन आयोग धाउँदैछन् । मधेशप्रति संवेदनशील नरहेका देव एक बुद्धिजीवी प्राविधिक नेता मात्र हुन् । जितेन्द्र देवको बौद्धिकतामाथि प्रश्न नरहे पनि समाजका अन्य अधिकारकर्मीसँग सौहार्दपूर्ण सम्बन्ध हुनुको साटो अध्यक्ष र विदेशी शक्तिकेन्द्रहरूको सामिप्यताले शंका उब्जाउँछ

     प्रसंग (५) ः मधेश कित्तामा नआउञ्जेल महेन्द्र यादव (२०६४ साल पूर्व) भूमिसुधार, नागरिकता, मधेशवादी एकताका विरूद्धमा वकालत गरेर एमालेभित्र खसभक्तिको नवीकरण गरिरहन्थे । आफ्नो जीवनको अधिकांश समय वाम राजनीतिमा बिताएका यादव मधेशी कित्तामा प्रवेश गरेपछि पटकपटक मन्त्री त भए तर मधेशका निमित्त कुनै उदाहरणीय कार्य गर्न चाहेनन् । सत्ता समीकरण मिलाउन र मोर्चाबन्दी गरेर सिंहदरबार छिर्न चतुर खेलाडीको मान्यता पाएका महेन्द्र यादवलाई पैसा र जातबाहेकका कुरामा खासै सरोकार नराख्ने नेताको रूपमा चर्चा गरिन्छ । एमालेमा छँदा उनी नेपाल सद्भावना पार्टीलाई नेपाल विरोधी दलको रूपमा चर्चित गर्थे र आज आफै मधेशी कित्तामा राजनीति गर्दैछन् ।

     प्रसंग (६) ः ऋतिक प्रकरणमा जयप्रकाश गुप्ता (तत्कालीन नेपाली कांग्रेसका नेता र संचारमन्त्री)ले मुलुकभरि नै मधेशीहरूमाथि भएको लुटपाट र आक्रमणलाई स्वस्फूर्त र स्वाभाविक घटनाको दर्जा दिएका थिए । गजेन्द्र नारायण सिंहलाई लक्षित गर्दै उनले भनेका थिए, “धोती कुर्ता लगाएर मधेशको उद्धार हुन सक्दैन । चौकीमा माइक लगाएर धोती हातमा उठाएर हिन्दीमा भाषण गर्न मलाई पनि आउँछ ” (प्रसंग २०५१ साल, राजविराज)
२०६४ पछि कृषि र संचार मन्त्री भएका गुप्ताले मधेशकै लागि खासै केही निर्णायक कार्य गर्न सकेनन् । उनी मन्त्री हुँदा पहाडी र कांग्रेसमा रहेका मधेशीहरू बढी लाभान्वित भए । उनकै विशेष पहलमा सत्ताका भागवण्डा मिलाइएपछि उपेन्द्र यादव नेतृत्वको पार्टी फुट्यो र मधेशी दलहरू माओवादीको पोल्टामा पुगे । सरकारले उनलाई तारो बनाएर नियतवश दण्डित भए । उनी फोरम नेपाल पार्टी फुटाउँदा सार्वजनिक रूपमै भनेका थिए, “म मन्त्री बन्दिँनतर मौका पाउने बित्तिकै सञ्चारमन्त्रीको पद कुम्ल्याए । पटकपटक मन्त्री भएका गुप्ता हाल मधेशमा अमृतालिंगम् प्रवृत्तिको विरोध र राजनीतिक आदर्शमाथि जागरण अभियान थालेका छन् ।

       प्रसंग (७) विजय गच्छदार सत्ता प्राप्तिका निमित्त जोसँग र जस्तो पनि सम्झौता गर्न पछि नपर्ने गच्छदार २०४८ सालतिर नेपाल सद्भावना पार्टीलाई विखण्डनकारी शक्तिको रूपमा व्याख्या गर्थे । २०६४ सालमा महन्थ ठाकुरलगायतका कांग्रेसी नेतालाई धोका दिएर फोरम नेपाल प्रवेश गरे । आफ्नो अध्यक्षता ठाकुरले अस्वीकार गरेको रिसमा तमलोपा फुटाउन महेन्द्र यादव समूहलाई सघाए ।
भौतिक योजना मन्त्री बनेका गच्छदारले मधेशमा विकासका कुनै नयाँ परियोजना ल्याएन, हुलाकी सडक, रेल यातायातलगायत थुप्रै सम्भावित परियोजनालाई लत्याएर पहाडमा बाटो बनाए । गृह मन्त्री गच्छदार रहे पनि मधेशमा गैरन्यायिक हत्या, गैरन्यायिक हिरासत, नागरिकता, सुरक्षा निकायमा मधेशीको पहुँचलगायतका मुद्दाले कुनै स्थान पाएन । रक्षामन्त्री भएका गच्छदारले सेनामा मधेशीको सामूहिक प्रवेशलगायतका मुद्दा भाषणमै सीमित राखे । सरकारमा छिर्न मजफो नेपाल फुटाएका गच्छदारका अधिकांश नियुक्ति, कार्य, परिणाम मधेश विरोधी छ । २०६५ चैत्र विराटनगरमा (मजफो नेपालमै हुँदा) उनले भनेका थिए, “फोरमले एक मधेश एक प्रदेश छाडिसकेको छ ।फोरम लोकतान्त्रिक गठन गर्दा २०६६ आषाढ १६ गते म ३ महिनामा मधेशका मुद्दाहरू सम्बोधन गराउँछु भन्दै माधव नेपालको नेतृत्वको सरकारमा प्रवेश पाए ।
व्यवहारमा वर्र्षौं बितिसक्दा पनि मधेशीले केही पाएन । २०६४ सालमा गच्छदारले मधेश प्रदेश सम्भव छैन ।भनी उद्घोष गरे । २०७० मंसिर तेस्रो साता विराटनगरमामधेशीलाई नसमेटेर सरकार बनाउन पाइदैँनभनी कांग्रेससँग धम्कीपूर्ण बिन्ती गरे । विजय गच्छदारले गरेका राजनीतिक नियुक्तिहरू, रोजगारी, विकास योजना र पार्टी संरचनाका अधिकांश कार्य मधेश विरोधी छ ।

      प्रसंग (८) ः शरत्सिंह भण्डारी ः एक दर्जन भन्दा बढी पटक मन्त्री भइसकेका शरत्सिंह भण्डारी मधेश कित्तामा आउनु पूर्व कांग्रेसका नेता थिए । सम्पूर्ण राजनीतिक जीवनमै उनले मधेश र मधेशीको अधिकारका निमित्त कुनै ठोस कार्य गरेनन् । पर्यटन मन्त्री हुँदा जनकपुर हवाई अड्डा निर्माणको साटो पोखरातर्फ बजेट मोडे । मध्यमधेश(जलेश्वर)बाट जाने रेल्वेको सर्वेलाई प्रभावित गरेर बर्दिवास (हाइवे) हुँदै लगे । मधेशी दलमा सभासद् खरिदबिक्री, पार्टी फुटाउ परियोजना, मधेशवादको आडमा प्राप्त नियुक्तिको अवसरहरू मधेश विरोधी समुदाय वा व्यक्तिलाई दिने कार्य । मधेशवादलाई आधार बनाएर सत्ता, पैसा, स्वार्थको राजनीति गरेर बसेका भण्डारीले मधेश विद्रोहपश्चात् मधेशका पक्षमा भन्न मिल्ने गरी रक्षा मन्त्री पदबाट राजीनामा बाहेक केही गरेनन् ।
मधेश विद्रोहपश्चात् मधेशी समुदायबीच हुन थालेको सम्भावित एकता र युवा नेतृत्वलाई कमजोर बनाउन विभिन्न नाम र आकर्षक नारा लिएर मधेशी कित्तामा हाम फालेका चतुर खेलाडीहरू मधेशका मुद्दा बेचेर पटकपटक सत्तामा पुगे । मधेशमा गैरन्यायिक हत्या, गैरन्यायिक हिरासत, सशस्त्र अपराध, सरकारी विभेद भइरहँदा पनि सिंहदरबारमा लुकेर बसेका अवसरवादी नेताहरूलाई यसपटकको निर्वाचनमा जनताले दण्डित गरेका छन् । दर्जनौं राजनीतिक र सामाजिक अपराध गरेका मधेशी मन्त्रीहरूको वैचारिक निर्वस्त्रीकरणका कारण मधेशले न्याय पाएन । मधेशप्रति प्रेम र मधेशी जनतासँग भय नरहेकै कारण आम मधेशीहरू प्रयोगका वस्तु मात्रै भई बसे । २०६२÷०६३ अघि मधेश, मधेशवाद र मधेशी जनताको विरोध गर्नेहरू अवसरका लागि मोर्चाबन्दी गरेर मधेशको घरेलु राजनीतिलाई फिजीकरण गरेर मधेशको सम्भावित एकता र विद्रोहलाई स्थिल पार्न मधेश राजनीति गर्दै बसेका छन् ।

सप्तरी क्षेत्र ३ बाट संघीय सांसद पदमा सुरेन्द्र मधेसीको उम्मेदवारी घोषणा

सप्तरी , ०३ कार्तिक  । सप्तरी  जिल्लाको निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ बाट सुरेन्द्र मधेसीले आगामी प्रतिनिधि सभा निर्वाचनमा आफ्नो उम्मेदवारी घोषणा ग...