Thursday, March 23, 2017

नेपाली नेताओं का विरोध बंद करे, शासक नहीं शासन को बदलने का प्रयत्न करें : डॉ. सी.के.राउत

डॉ. सी.के. राउत 
राज्य व्यवस्था में यह कहना बिलकुल ही गलत है कि किसी एक व्यक्तिद्वारा पुरे शासन सत्ता संचालन होती है | वह भी खासकर लोकतान्त्रिक राज्य व्यवस्था में | लोकतन्त्र में जन निर्वाचित संसद और सरकार रहती है | विधी और विधान से राज्यसत्ता चलती है | जनता की अभिमत से बिधी एवं विधान बनती है | अत: कोई एक व्यक्ति विधी को परै रखकर शासन-सत्ता नहीं चला सकते | आजके यूग में हिटलरी शासन लोगों पर लाद नहीं सकते | लोकतन्त्र में प्रधानमंत्री स्वेच्छाचारी हो जाय, अराजक बन जाय, गैर-कानूनी हर्कत पर उतारू हो जाय तो विधी विधान के माध्यम से उनपर रोक लगा सकते हैं | उन्हें पदमुक्त कर कारबाही चला सकते हैं | परंतु राज्य में विधी विधान पर आपका नियन्त्रण नहीं होना दुसरी बात है |
आजकल केपी ओलीको दिखाकर मधेशी जनता को दिगभ्रमित किया जा रहा है | यह सरासर गलत हैं | हर शासक चाहता है उनका देश और देशपर उनका शासन कायम रहे | यह ओली भी चाहेगा, देउवा और प्रचण्ड भी चाहेगा, हर एक नेपाली लोग चाहेगा |
नेपाली राज में मधेशियों के लिए हर एक नेपाली शासक समान है | गिरिजा कोईराला हों या उनके गृहमंत्री कृष्ण सिटौला, सुशील कोइराला हों या उनके गृहमंत्री बामदेव, केपी ओली हों या उनके गृहमंत्री शक्ति वस्नेत हर शासक नें मधेशियों का खुन पिया है | हर एक नें हमारे वेटियों को विधवा, वच्चों को यतिम और बुढ़े माँ-बाप को बेसहारा बनाया है | फिर शासकों में भिन्नता की यह दीखावा कैसी ? सुशीलजी को वोट देने केपी ओली को गाली दो और प्रचण्ड को प्रधानमंत्री बनाने केपी ओली को तानाशाही बता दो, यह कैसा खेल है ? मधेशी जनताको वेवकूफ बनाने की काम शीघ्र बन्द होनी चाहिए |
सभी जानते हैं : 
केवल दो लाख वेलायती लोग ६० करोड़ हिन्दुस्तानियों पर शासन चला रहे थे | भारतीय को ही सैना, पुलिस बनाकर उनपर उपनिवेश लादे हुए थे | भारतीय जनता पर क्या लौर्ड कर्जन, हेसिंगटस, जनरल डायर, अक्टरलोनी ही उपनिवेश चला रहे थे ? बिलकुल ही नहीं | ६० करोड़ पर दो लाख वेलायतियों का शासन टिक ही नहीं सकता था | परंतु सैकड़ों वर्ष शासन कायम रहा, टिका रहा, क्यूँ ? उपनिवेश काल में शासक बदलते रहे फिर भी शासन चलती ही रही, क्यूँ ?
वास्तव में शासन व्यक्ति से नहीं बल्कि संविधान, कानून और संरचना के बूनियाद पर कायम रहती है | जैसा संविधान, वैसा ही कानून और उस अनुकुल के शासकीय संरचना से ही किसी भी मुल्क की शासन चलती है |
यह वास्तविकता हमें जानना होगा |
वेलायती उपनिवेश में भारतीय कानून और संरचना का निर्माता अँग्रेज थे | यही कारण था कि करोडौं भारतीय पर उन्हीं के सहारे वेलायती उपनिवेश को कायम रखने में अँग्रेजी शासक सफल हो रहे थे |
मधेश पर आज ठीक वैसा ही है | नेपाली शासक को बदल देने से मधेश पर सैकड़ों वर्षों से कायम रहे उपनिवेश खत्म नहीं हो जाएगी | ओलीजी के जगह प्रचण्डजी आनेसे या ओलीको हटाकर देउवाजीको ले आने से मधेशियों पर चल रहे उपनिवेश, शोषण, दमन, उत्पीड़न, अत्याचार रूक नहीं जाएंगे | क्यूँकी शासक समस्या नहीं है | बल्कि हमारी मुख्य समस्या नेपाली औपनिवेशिक शासन है | नेपाली उपनिवेशद्वारा बनाए गए नेपाली संविधान, कानून एवं संरचना प्रमुख समस्या है | ईस यथार्थ को स्वीकार कर इसे बदलना होगा | नेपाली उपनिवेश को खत्म करके मधेशियों का अपना शासन बनाना होगा |
नेपाली साम्राज्य को अन्त कर स्वतन्त्र मधेश देश निर्माण करना होगा |
गान्धीजी नें भी शासक बदलते रहते तो वेलायती उपनिवेश खत्म नहीं हो जाता | वेलायतियों के संविधान और शासन को मानकर संघीयता माँग लेने से गुलामी अन्त नहीं हो जाता | उन्हों नें सोचा, सोच विचार करके ही तय किया कि वेलायतियों को भारतीय उपर कर रहे शासन छोड़ना पड़ेगा | इसके लिए स्वतंत्रता संग्राम/आन्दोलन उठाया | "भारत छोड़ो" का बुलन्द आवाज़ पुरे हिन्दुस्तान में फैलाया | और कठिन संघर्ष के बाद गुलाम भारतको आजाद़ भारत बनाया | हमें भी वही करना होगा | राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री कोई भी बने परंतु संविधान, कानून और संरचना मधेश बासियों का होना पड़ेगा | सैना, पुलिस, कर्मचारी और राज्य संयन्त्र पर नियन्त्रण मधेशियों का रहना पड़ेगा | तभी मधेश और मधेश बासियों का कल्याण होगा | अस्तित्व, आत्म-सम्मान और भविष्य सुरक्षित एवं सम्मानित रहेगा |
इसलिए अब मांगने का नहीं, खुद बनाने का काम करें | गुलामी कायम रखने का नहीं, आजाद़ी लानेका प्रयत्न करें | शासक बदलने का नहीं, शासन बदलने की दिशा में कार्य करें | निरन्तर बढ़ें, बढ़ते ही रहे...

"अबकी बार एक ही मांग, जनमत संग्रह का हो ऐलान !
नेपाली उपनिवेश अन्त हो, मधेश देश स्वतन्त्र हो !!"

Saturday, March 18, 2017

अपने गाँव, टोल, चौक, नगर, शहर का नेतृत्व खुद लें और महा-आन्दोलन के लिए तैयार रहे : डा. सी. के. राउत

आदरणीय जन-समुदाय,
सारे विकल्प, सारे रास्ते बन्द हो चुके हैं | हम सबनें देख ही लिया है : गजेन्दर बाबू से लेकर उपेन्दर बाबू तक वर्षों वर्ष हमनें आन्दोलन किया, पिछले साल ५ महिने तक नाकाबंदी भी किया, १०० से अधिक मधेशियों का प्राण केवल पिछले ०६३/६४ से अभीतक शान्तिपूर्ण आन्दोलन में गवाएँ हैं | ५०औं बार बार्ता हुआ, सम्झौता हुई | कभी २२ बुँदे, कभी १२ बुँदे, कभी ११ बुँदे, कभी ८ बुँदे, कभी ४ बुँदे, कभी ३ बुँदे परंतु सदैव मिला मधेशियों को शुन्य और धोखा |
हमारे मधेशी मोर्चा कमसे कम खुद मधेशी होकर, मधेशी मुद्दे उठाकर, मधेशी भुमिपर रहकर आन्दोलन करते हुए कड़ा संघर्ष करते रहे लेकिन काँग्रेस, एमाले और माओवादी जैसे पार्टियों में रहे हमारे नेताजी तो सदैव मधेशी मौत का तमाशा ही देखते रहे हैं |
अब और ईन्तजार हमारे लिए उचित नहीं | अब कोई बुँदा नहीं, कोई वार्ता नहीं, कोई सम्झौता नहीं, कोई धोखाधड़ी नहीं केवल १ बुँदा :
"आजाद़ मधेश, मधेशियों का अपना देश !"
आजादी हमारे लिए होगी, हमारे बच्चों के लिए होगी | एकभी मधेशी गुलाम नहीं रहेगी, जो बच्चा कल आनेवाले हैं, वह भी आजाद़ मधेश की भूमि पर स्वतन्त्र मधेशी नागरिक के रूपमें खुली हावा में पैदा होगी | इसलिए ईसमें कोई धोखा नहीं, कोई विश्वासघात नहीं | आजाद़ी आन्दोलन कोई सांसद, मंत्री, प्रधानमंत्री, राष्ट्रपति के लिए नहीं है जो किसीको धोखा मिले या केवल नेतागण एवं कार्यकर्ताओं को ही मिले | आजाद़ी आन्दोलन तो स्वतन्त्र नागरिक बननेका आन्दोलन है | आजाद़ मधेश हुआ तो एक समान हम सब आजाद़ होंगे |
अत: अब मधेशियों को भीख नहीं, केवल आजाद़ी चाहिए | अब कोई धोखाधड़ी नहीं वास्तविक मानवीय हक और अधिकार चाहिए |
हमें करना क्या है ?
आजाद़ी आन्दोलन नेताओं का आन्दोलन नहीं है | यह कार्यकर्ताओं का आन्दोलन भी नहीं है | यह आपका आन्दोलन है | सारे मधेशियों का आवश्यकता है | आजाद़ी आन्दोलन जनता की आन्दोलन है | यह जन आन्दोलन है, महा आन्दोलन है | 
ईस महा अभियान में हर मधेशियों को हिस्सा लेना होगा | चामल, दाल खुद जूटाना होगा | संगठन, एकता, फोर्स अपना जगह खुद बनाना होगा | यह केवल शहर का आन्दोलन नहीं है | यह तो हर गाँव, टोल, चौक, नगर और शहर में मिलकर करना होगा | आजाद़ी आन्दोलन का नेतृत्व आपको ही संभालना है | यहाँ नेता कोई नहीं है, सभी आजाद़ी के अभियन्ता है | डा. सीके राउत कोई मसिहा नहीं है, वे तो केवल आपके सेवक और पथ-प्रदर्शक हैं | आजाद़ी का मार्ग दर्शक हैं |
ईसलिए अपने गाँव, नगर, शहर की तैयारी खुद ही करें | अपनी जगह से आन्दोलन भी आप ही करे और मधेश राष्ट्र के नेता भी आप ही बनें | राष्ट्र निर्माता हम भी और आप भी बनें | आप गाँव, नगर, शहर, चौक या बजार जहाँ भी रहते हों, वहीं
५ से ७ स्वराज मधेश निर्माण समिति गठन कर लें,
न्यूनतम ११ सदस्यीय युवा, किसान, विद्यार्थी, बेपारी, कर्मचारी का अलग अलग संगठन बना लें,
७ से ५१ सदस्यीय ५५ वर्ष से उपर उम्र रहे बुजूर्गों को रखकर स्वराज अभियान सहजीकरण समिति बना लें,
५१ से उपर जितनी हो सके महा-आन्दोलन अगुवाई समिति निर्माण कर लें,
उदघोषक, विश्लेषक, राजनीति में दक्ष, योजनाकार, संगठक, प्रशिक्षक, कलाकार, IT में दखल, लेखक, पत्रकार आदि सम्मिलित मुख्य स्वराज नेतृत्व टीम बना लें,
गाँव, टोल, नगर में रहे जनसंख्या के आधार पर प्रति ५० जन १ सक्षम एवं तालिम प्राप्त 'स्वराज स्वयं-सेवक समिति' बना लें,
उपलब्ध स्वास्थकर्मी, वकिल, पत्रकार, अधिकारकर्मी आदि सम्मिलित १ टीम भी बना लें,
सभी तैयारी कर लें और महा-आन्दोलन के लिए तैयार रहें |
सभी गठन करने के बाद खुद या परिचित स्वराजी मार्फत सारे डेटा/सूचना केन्द्र को भेज दें | आपसे विनम्र आग्रह है |
जय मधेश !

"अबकी बार एक ही मांग, जनमत संग्रह का हो ऐलान !"
"
नेपाली उपनिवेश अन्त हो, मधेश देश स्वतन्त्र हो !!"

मैं संघीयता का विरोधी नहीं हूं, पर बहुत जल्द मधेश का भ्रम टूटेगाः डॉ.सी.के. राउत

अभी मधेश में दो धार समानान्तर में चल रही है, एक है उनका जिसे मधेश ने चुना था और अपने प्रतिनिधि के रूप में केन्द्र में भेजा था, दूसरी धार है डा.सी.के. राउत की जिन्हें कुछ दिनों पहले तक वैज्ञानिक या फिर एक उग्र लेखक के रूप में जाना जा रहा था । किन्तु आज सी. के. राउत अचानक एक सशक्त आवाज के रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं, जिसके साथ पूरा मधेश हो ना हो किन्तु, युवाशक्ति जरूर है । आज उन्हें मधेश के मसीहा के रूप में जाना जा रहा है । कुछ तो है इनके व्यक्तित्व में कि सत्ता पक्ष भी चितिंत नजर आ रही है । सत्ता पक्ष यह निर्णय नहीं कर पा रही कि, इनके साथ किया क्या जाय ? जब किसी रैली को सम्बोधित करने की बात होती है तो डा. राउत की गिरफ्तारी हो जाती है और फिर तत्काल छोड़ दिया जाता है । एक अस्पष्ट नीति सरकारी तंत्र की ओर से दिख रही है । यह एक नाम सरकार के लिए साँपछुछँुदर वाली स्थिति पैदा किए हुए है जिसे ना निगला जा रहा है और ना ही उगला जा रहा है । डॉ. राउत से उनकी कार्यनीति और मधेश की परिस्थिति पर हिमालिनीसंपादक श्वेता दीप्ति से हुई बातचीत का संक्षिप्त ब्योरा
० स्वतन्त्र मधेश का नारा लेकर आप एकला चलो की नीति अपनाए हुए हैं, यह कहाँ तक कारगर सिद्ध होगी ?
मैं अब अकेला नहीं हूँ, शायद जब चला था तो अकेला था पर, अभी मधेश की जनता मेरे साथ है । मैं जो आवाज उठा रहा हूँ मधेश को लेकर, यह आवाज पूरी मधेशी अवाम की है, इसलिए वो मेरे साथ हैं । और यह माँग नई नहीं है, हाँ इसे कभी पुरजोर आवाज नहीं मिली और न ही प्रभावशाली तरीके उठाया गया । एक भय और त्रास उनके मन में था पर अब वो सशक्त हो रहे हैं । अपनी पहचान और अधिकार के लिए सजग हो रहे हैं । आज अगर यह एक घर की आवाज है तो कल यह सम्पूर्ण मधेश की आवाज बनने वाली है ।
० क्या आपको नहीं लगता कि आपको कोई मंच की आवश्यकता है या अभी आप सिर्फ भीड़ जुटाने का काम कर रहे हैं ?
मैंने कहा न कि मैं अकेला नहीं हूँ जनशक्ति मेरे साथ है और ऐसे में मंच भी स्वतः तैयार हो जाता है । रही भीड़ जुटाने की बात तो आपने देखा होगा कि बिना किसी प्रचारप्रसार के जनता स्वतःस्फूर्त रूप में मेरे साथ हो लेती है और यह मेरा मनोबल बढ़ाता है । मधेश की जनता जग रही है अपने अधिकार को पहचान रही है जिसे अब कोई शक्ति दबा नहीं सकती ।
० आपकी कोई कार्यशैली या नीति जिसके तहत आप आगे बढ़ रहे हैं ?
जी हाँ हम सोची समझी कार्यनीति के तहत आगे बढ़ रहे हैं, क्योंकि बिना किसी पूर्वाधार और योजना के आगे बढ़ने पर असफल होने का डर रहता है । हमारी पहली नीति है संजीवनी की, यह हमारा पहला चरण है, जिसके तहत हम अभी  अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं । संजीवनी का अर्थ होता है वह औषधि जो मृतप्राय को भी जिन्दा कर दे । मधेश सदियों से शोषित, दमित और मृतप्राय है । मैं इसे अभी जाग्रतावस्था में लाने की कोशिश में लगा हूँ क्योंकि औरों को जगाने से पहले स्वयं को जगाने की आवश्यकता है । आत्मा जगती है तो चेतना आती है और तभी आपको क्या मिला है और आप क्या पाने के अधिकारी हैं यह समझते हैं । इसलिए संजीवनी के साथ हम इस प्रयास में लगे हैं कि मधेश यह जाने कि वह किस तरह औपनिवेशिक शासन में जी रहा है । जागरुकता के बाद संगठन का चरण आएगा जिसमें हम बहुत जल्द प्रवेश करने वाले हैं । संजीवनी का चरण भी साथसाथ चलता रहेगा । स्वतन्त्र मधेश गठबन्धन की घोषणा दो वर्ष पहले ही हो चुकी थी । हमारा प्लेटफार्म तैयार है और जनता हम से जुड़ रही है । हम यूँ ही आगे नहीं बढ़ना चाहते हम सजग और सचेत जनता को  साथ लेकर आगे बढ़ने को तत्पर हैं ।
० अन्य मधेशी दलों और संघीयता के विषय पर आप क्या कहना चाहेंगे, क्या आप संघीयता विरोधी हैं ?
नहीं मैं संघीयता विरोधी नहीं हूँ किन्तु, मैं यह जानता हूँ कि मधेश की समस्या का हल संघीयता तो बिल्कुल नहीं है । इसलिए हम आजाद मधेश के एजेण्डे के साथ आगे बढ़ रहे हैं । मैं एक उदाहरण दूँ आपको कि अभी मधेश में जो सेना परिचालित है वो मधेश की नहीं है उसमें ९५ प्रतिशत सेना बाहर की हैं । कल अगर संघीयता मिल भी जाती है तो ये औपनिवेशिक सेना मधेश से जाने वाली नहीं है । दूसरी समस्या जो है वो आप्रवासन को लेकर है अभी मधेश में एकतरफा अप्रवास अर्थात पहाड़ी मूल के लोगों का वहाँ आना और बस जाना है । कुछ सालों से यह तीव्र गति से बढ़ा है और यह एकतरफा बढ़ रहा है । सन् १९५१ में मधेश में पहाड़ियों की संख्या सिर्फ ६ प्रतिशत थी परन्तु २००१ में यह ३३ प्रतिशत तक बढ़ा है यह चिन्ता का विषय है । यह दोनों ओर से होता तो कोई बात नहीं थी पर आज आदिवासी, जनजाति आदि की जमीन पर शासक वर्ग के लोगों का कब्जा है और ये भूमिहीन हो चुके हैं । यह जो स्थिति है वह संघीयता दूर नहीं कर सकती है । और मधेश के जो प्रतिनिधि सत्ता के गलियारे में हैं या उसके बाहर हैं उसकी स्थिति और नीयत दोनों मधेश के सामने है । अगर संघीयता मिल भी जाती है तो, उसके बाद भी बहुत जल्द मधेश का भ्रम टूटने वाला है क्योंकि मधेश चलाने वाले हाथ यही होंगे, सोच इनकी ही होगी और संचालन कहीं और से होगा ।
० मधेश जिस दौर से गुजर रहा है, क्या आपको नहीं लगता कि इसके जड़ में कहींनाकहीं अशिक्षा और गरीबी है ?
नहीं, मैं यह नहीं मानता अशिक्षा और गरीबी तो अपनी जगह है पर मधेश की इस हालत का जिम्मेदार यहाँ का उपनिवेशवाद है जिसने मधेश को कभी बढ़ने ही नहीं दिया है । मधेश आज तक शोषित होता आया है बस इसे अब आजाद कराना है । मधेश आज तक परतंत्र है और यही कारण है कि ना तो आज तक उसका विकास हुआ ना वहाँ से गरीबी का उन्मूलन हुआ और ना ही सही वातावरण तैयार हो सका है । इसलिए हम सब इस के जड़ में जाना चाहते हैं पेड़ की डालियों या उसकी फुनगियों को हराभरा कर के जड़ को मजबूत नहीं कर पाएँगे । अगर जड़ मजबूत होता है तो उसकी डालियाँ भी स्वतः मजबूत होंगी । आपको पता होगा कि मधेश अन्न का भण्डार है, सबसे अधिक अनाजों की पैदावार यहाँ होती हैं और गौर करने वाली बात यह है कि सबसे अधिक भुखमरी गरीबी और कुपोषण मधेश में ही है । १९ प्रतिशत जनता इसकी शिकार है और यह आँकड़ा पहाड़ से दोगुणा है । मधेश का अनाज नेपाल खाता है और वहीं की यह स्थिति है इसके पीछे सबसे बड़ी वजह है कि मधेशियों का उसपर अधिकार नहीं है वह सब बाहर चला जाता है । मधेश के पिछड़ेपन का मूल कारण उपनिवेशवाद ही है ।
० संजीवनी, संगठन और उसके बाद ? क्या उपलब्धि की कोई समयसीमा निर्धारित है ?
संजीवनी, संगठन और उसके बाद का चरण है संघर्ष और फिर उसकी उपलब्धि । संघर्ष लम्बा चलने वाला है क्योंकि इतनी आसानी से हमें वो मिलने वाला नहीं है जो हम चाहते हैं । ८ से १२ साल की समय सीमा हमने सोची थी किन्तु हम योजना तो बनाते हैं पर सब उसके अनुसार ही होता जाय यह आवश्यक नहीं, क्योंकि व्यवधान तो उत्पन्न होता है । इसलिए यह लड़ाई कितनी लम्बी चलेगी फिलहाल कुछ निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता है । किन्तु हम अब रुकने वाले भी नहीं हैं और पीछे हटने वाले भी नहीं हैं । आठ वर्ष की अवधि हमने तैयारी के लिए सोच रखा था पर यह समय सम्भवतः कम है ऐसा लग रहा है । इसलिए अभी समय लगेगा ।
० अन्य मधेशी दलों का आपको समर्थन नहीं है, क्या आप उनके साथ या किसी और के साथ जाना चाहेंगे ?
मैं अपनी स्पष्ट नीति के साथ आगे बढ़ रहा हूँ जबकि उन दलों के पास कोई स्पष्ट नीति नहीं है कोई कभी किसी ओर जाता है तो कभी किसी ओर । मैं अभी संगठित हो रहा हूँ और बहुत जल्द एक नाम और एक संगठन के साथ सामने आऊँगा । क्योंकि मेरे साथ मधेशशक्ति है ।
० आप पर आरोप लगाया जाता है कि आपको विदेशों का संरक्षण प्राप्त है या युएनए से जुड़े हुए हैं इस सन्दर्भ में आप कुछ कहेंगे ?
देखिए जब भी किसी राष्ट्र में कोई परिवर्तन की लहर चलती है तो अन्य राष्ट्रों का ध्यान भी आकर्षित होता है । यह एक अन्तर्राष्ट्रीय मुद्दा भी बन जाता है जो सहायक ही सिद्ध होता है । हम भी चाहेंगे कि हमें ऐसा समर्थन प्राप्त हो हालाँकि अभी तक तो ऐसा समर्थन नहीं मिला है, समर्थन अगर मिला भी है तो मानवअधिकार के मुद्दे पर या राज्य स्वतन्त्रता के मुद्दे पर । पूर्ण स्वतन्त्रता के विषय पर कोई ऐसा समर्थन अभी तक नहीं मिला है और अगर कल को मिलता है तो यह हमारे लिए सकारात्मक ही होगा । अभी जो मेरा नाम या मेरे कार्यकर्ताओं का नाम युएनए से जोड़ा गया, प्रचार किया गया उससे हमें फायदा ही हुआ है वो गलत करना चाहते हैं पर हमारा इसी बहाने प्रचारप्रसार हो जाता है ।
० आगे की रणनीति ?
मधेश बारबार बलिदान देता आया है । किन्तु आज तक उसे उसका प्रतिदान नहीं मिल पाया है । कितने सपूतों ने अपने प्राण दिये । पर हासिल क्या हुआ ? इसलिए हम समस्या की जड़ तक जाना चाह रहे हैं । कितने काँटें हमारे चारो ओर उग रहे हैं और हम अभी उसे एकएक कर निकालने की कोशिश कर रहे हैं । अभी कल मेरी पेशी है । और मैं प्रायः अपने गाँव की तरफ ही रहता हूँ । ये सिलसिला कब तक चलेगा यह तो पता नहीं पर लडाÞई लम्बी जाने वाली है । हमने माघ आठ का ख्याल कर के अपने को रोका यह सोच कर कि हम पर यह आरोप नहीं लगे कि हमारी वजह से संविधान नहीं आया पर देखिए नेताओं ने देश को क्या दिया ? संघीयता की बात आ रही है, पर मैं बारबार कह रहा हूँ कि यह मधेश की समस्या का हल नहीं है । जब तक औपनिवेशिकता का अंत नहीं होगा तब तक मधेश की समस्या का हल नहीं होनेवाला है ।
० हर आन्दोलन के लिए अर्थ की आवश्यकता होती है आपकी अर्थपूर्ति कहाँ से हो रही है ?

अभी तक हमें ज्यादा पैसों की जरूरत ही नहीं पड़ है । मैं जहाँ जाता हूँ भीड़ जमा हो जाती है और मैं अपनी बात उन तक पहुँचा देता हूँ । जनता खुद हमें बुला रही है और वो स्वयं व्यवस्था करती है । हमने अभी तक कोई ऐसा आयोजन नहीं किया जहाँ बहुत अर्थ की आवश्यकता हो और हमारी लड़ाई अहिंसात्मक है इसलिए भी हमें इसकी कोई खास आवश्यकता नहीं है । मुझे पूरा विश्वास है कि मधेश और मधेशी मेरे साथ हैं, यह साथ ही मेरा मनोबल बढ़ाता है और हमें मानसिक, शारीरिक और आर्थिक शक्ति देता है । यही शक्ति हमारे कार्यकर्ताओं में जोश भरता है और हमें आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करता है । कोई हिंसा हम नहीं चाहते, बस हमें हमारा अधिकार चाहिए, स्वाभिमान चाहिए और स्वराज्य चाहिए । और मैं मधेशी दलों से भी आह्वान करता हूँ कि वो मेरे खिलाफ दुष्प्रचार ना करें बल्कि हमारे साथ आएँ और खुले मंच पर बहस करें । मैं उम्मीद करता हूँ कि बहुत जल्द हो ना हो पर कामयाबी हमें मिलेगी अवश्य ।

Thursday, March 16, 2017

मधेशी निर्णय ले कि उसे नेपाली साम्राज्य चाहिए या मधेश का स्वराज्य ? कैलाश महतो

देश आस्था का केन्द्र होता है । आस्था जगता है प्रेम से । पे्रम जगता है दोतर्फी आकर्षण और लगाव से । पे्रम बढता है विश्वास से और विश्वास बढता है त्याग से । देश जबर्जस्ती नहीं बनता । वह बनता है समानता के आधार पर । समानता किसी अदालत के कटघरा में नहीं, न्यायालय के मन्दिर में होती है ।

क्या नेपाली अदालत में न्यायालय है ? अगर है तो समानता है ? क्या वह नेपाल के ही संविधान को मनाती है ? नेपाल द्वारा हस्ताक्षरित संयुक्त राष्ट्रसंघीय अन्तरर्राष्ट्रिय मानवाधिकारों को सम्मान करती है ? है कोई दुनियाँ की अदालत या न्यायालय जो एक ही शीर्षक पर एक ही शख्स के उपर दर्जनों मुद्दे चलाये हों ? जिस मुद्दे को विशेष से लेकर सर्वोच्च तक ने खारेज की हो, वही मुद्दा सैकडों लोगों पर लगाए हों ? है संसार में ऐसी कोई अदालत जिसने विपक्षी वकिलों को बोलने तक न देकर राज्य या किसी शक्ति के दवाव में राज्य द्वारा मनपर्दी आरोपित किसी व्यक्ति को न्यायायिक मूल्य और मान्यता के विपरीत बारम्बार प्रहरी नियन्त्रण में रखने का आदेश देता हो ? जब न्यायालय ही अन्याय करे तो उस देश का शासन क्या नहीं कर सकता ?

ऐसा कहाँ होता है ? क्यूँ होता है ? साहित्य के विद्यार्थी होने के नाते मैंने पढा है कि ऐसे अदालत अमेरिका में रहे जहाँ किसी काले के साथ कोई गोरा द्वारा किसी भी प्रकार का अपराध होने के बाद सारे प्रमाण और आधारों के बावजुद गोरा अलादत गोरे के ही पक्ष में न्याय करती थी ।Dr. Martin Luther King Jr. ने कालों के उपर गोरों द्वारा हो रहे वैसे अत्याचारों के खिलाफ खडे होने की हिम्मत की, सरकार और न्यायालय समेत में हो रहे रंङ्गभेदी दुव्र्यव्हारों के खिलाफ आवाजें उठायी जिसके कारण ४ अप्रिल १९६८ को उनकी हत्या हुई । सन् १९५७ से लेकर १९६८ तक के उनके अथक प्रयास, निडर स्वाभाव और समानताभाव के आवाज ने अमेरिकी सरकार की आँखे खोल दी और सन् १७८७ सेप्टेम्बर १७ के दिन निर्मित अमेरिकी संविधान के १५वें संसोधन द्वारा सन् १८७० में काले लोगों को भी मतदान करने को दिए गए अधिकार जिसे कुछ समय बाद Jim Crow द्वारा निस्तेज की गयी थी को वापस काले लोगों को दिलवाया गया । President Johnson’s Civil Rights Act of 1964 ने काले अमेरिकी लोगों के मतदानीय अधिकार के लिए एक अनोखा इतिहास कायम की जिसने उन लोगों को भी सारे अधिकारों सहित उन्हें पूर्ण अमेरिकी नागरिक का दर्जा देते हुए मतदान करने का अधिकार को पूनः सुनिश्चित किया और वे सन् १९६५ से मतदान कार्य में हिस्सा लेने लगे । उसके साथ ही सदियों से गोरा द्वारा कालों पर हो रहे दासीय, अमानवीय, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक तथा कानुनी आदि सारे विभेद खत्म किए गए । कालों के हक अधिकारों के साथ साथ गोरे जैसे ही समान जीवन के लिए गोरी महिलाओं ने भी सरकार से अपिल कीं । इसका मुख्य नायक Dr. Martin Luther King  Jr. ही रहे । उनको मिले नोवेल शान्ति पुरस्कार की रकम भी उन्होंने नागरिक अधिकार आन्दोलन को सहयोग के नाम पर दान कर दिया ।

आदिवासी अमेरिकी काले लोगों को दास और गुलाम बनाये बैठे गोरे अमेरिकीयों नेMartin Luther की भाषा को समझा । उनमें समझने की हैसियत थी, योग्यता थी, क्षमता थी और दुरदर्शिता थी । इसिलिए अमेरिका को एक देश के रुप में बचाये रखने के लिए गोरों द्वारा कायम नश्लीय अदालत, सुरक्षा नीति, प्रशासन, न्यायालय सबों में सुधार लाया गया । समानता कायम की गयी । रंङ्गभेद को मिटाया गया और आजका अमेरिका दुनियाँ के सामने खडा है सर्वशक्तिशाली राष्ट्र और देश के रुप में । नहीं तो आज का अमेरिका विगत में ही कई राष्ट्र और देशों में विभक्त हो गई होतीे ।

मधेश में जब जब अधिकार लगायत के आन्दोलन हुए, उन्हें भारत के नजरों से ही नेपालियों ने देखने का दुस्साहस किया । हकिकत यह है कि मधेशियों का सम्बन्ध भारत के समान्य परिवारों से है, न कि किसी राजा महाराजा या शासक लागों से या दिल्ली के शासन से । उनसे अगर किसी का सम्बन्ध है भी तो नेपाली लोगों का ही है । समान्य सी बात है कि जब दिल्ली दरबार या शासकों से समान्य मधेशियों का सम्बन्ध ही नहीं तो उन्हें भारत क्यूँ परिचालित करेगा ? लेकिन एक बात तय है कि समान्य मधेशियों का दैनिक जीवन में किसी प्रकार का भूचाल आया तो समान्य भारतीयों की भी परेशानी बढेगी । जब उनकी परेशानी बढेगी तो भारतीय सरकार या सत्ता चयन से रह ही नहीं सकता ।

हम संविधान संसोधन की बात करते हैं और एमाले किसी भी हाल में उसके लिए राजी नहीं है । हम सीमांकन की बात करते हैं, लेकिन मोर्चा के प्रधानमन्त्री तक ने कह दिया है कि सीमांकन पर अभी कोई बात नहीं हो सकता । हम मधेशी यूवाओं के लिए अवसर की बात करते हैं और मोर्चाप्रचण्ड सरकार का मुख्य सचिव ने बारम्बार बोला है कि मधेश सरकार लगायत के कोई भी प्रान्तीय सरकार अपने प्रान्त में अपने अनुसार से कोई भ्याकेन्सी नहीं खोल सकती, न किसी को नौकरी दे सकती । जल, जंङ्गल और जमीन, नागरिकता, विदेश नीति, अर्थ नीति, भंसार नीति और खानी तथा खनिज नीति केन्द्र के मातहत ही रहेंगी तो फिर हम कैसे प्रान्त का सरकार चलायेंगे ?

हम आन्दोलन के बल पर अगर पूरा संविधान ही अपने पक्ष में संसोधन करा लें, तो क्या फर्क पडेगा ? संसोधन उसी में होने की प्राकृतिक नियम और अधिकार होता है जो अपना होता है । हम उसी घर में अपने अनुसार के मरम्मत या सुधार कर या करवा सकते हैं जो अपना है । भाडे के घर में रहकर उसमें अपने अनुसार हम कोई परिवर्तन नहीं कर सकते या हमारे चाहने के अनुसार घर मालिक अपने घरको तोडफोड नहीं कर सकते । और वही बात नेपाली संविधान में भी लागू होती है । जिस संविधान को हमने बना ही नहीं पाया । जिसे बनाते समय हमसे कोई राय तक नहीं ली गयी, वो संविधान हमारा कैसे हो सकता है ? और जो हमारा है ही नहीं, उसमें हम सुधार कैसे सकते हैं ? वो नेपाली मालिक के हाथ में है । हमें हमारा अपना संविधान बनाना होगा । संविधान किसी देश का होता है । हमें हमारे देश का पूनर्निमाण करना होगा ।

हमने आजतक सिर्फ आन्दोलन की है, परिवर्तन नहीं । हमने सिर्फ शहादत दी है, शहीद नहीं बन पाये । जो मिले थे, उसे भी गवाँ दिए ।

हम लडे मुगलों से, गलतफहमी में पड गये । हमने अंग्रेजों को सहयोग की, धोखा खा लिए । हमने खेतों का निर्माण किया, मुलुकी ऐन का शिकार हो गए । पंचायत से दोस्ती की, भूमि सुधार ने भूमि हडप ली । प्रजातान्त्रिक नेताओं को पनाह दी, गैर नेपाली बना दिए । माओवादियों को हथियार दी, परिवारविहीन बना दिए । लोकतान्त्रिक आन्दोलन को किस्मत समझा, अस्तित्व मिटा दिया । गणतन्त्र को अपना भविष्य माना, संविधानविहीन बना दिया ।

मधेश ने आजतक सिर्फ लगानी की, बदले में पाया घाटों के अलावा कुछ नहीं । क्यूँकि संविधान उसीका होता है जो बनाता है । संविधान को वही चलाता है जिसका सेना होता है ।

हमने देखा है बसों में । बसों में समान्यतः तीन लोग होते हैं ः ड्राइवर, कन्डकटर और खलाँसी । बसका ड्राइवर मुखिया होता है, कन्डक्टर अर्थमन्त्री होता है और खलाँसी मजदुर होता है । मजदुर बेचारा सारा कठीन काम करता हैं, मगर पैसों से दुर रहता है । अर्थमन्त्री जो दे दें, जो खिला दें, वही काफी है, वही उसका भाग्य होता हैै । न ड्राइवर, न कन्डक्टर, मधेशी रहेगा खलाँसीअगर हम नहीं सुधरे तो ।


अब तो गाडियाँ भी एडभान्स होने लगी हैं । अब तो गाडियों के मुखिया और उनके अर्थमन्त्री खलाँसी भी रखना छोड रहे हैं । अब तो टेक्नोलोजिकल और सुविधा सम्पन्न हो रहे मालिक मजदुरों को काम भी देने से परहेज आने लगे हैं । और नेपाली साम्राज्य में वही हाल मधेशियों का होने बाला है । मधेशी निर्णय लेंअब क्या करना है ? उसे नेपाली साम्राज्य चाहिए या मधेश का स्वराज्य ? उसे नेपाली संविधान चाहिए या स्वतन्त्रता का ऐलान ? उसे नेपाली परतन्त्र संघीयता चाहिए या मधेश का स्वतन्त्रता 

सप्तरी क्षेत्र ३ बाट संघीय सांसद पदमा सुरेन्द्र मधेसीको उम्मेदवारी घोषणा

सप्तरी , ०३ कार्तिक  । सप्तरी  जिल्लाको निर्वाचन क्षेत्र नं. ३ बाट सुरेन्द्र मधेसीले आगामी प्रतिनिधि सभा निर्वाचनमा आफ्नो उम्मेदवारी घोषणा ग...